Donald Trump के लिए ‘वॉर ट्रैप’ बना ईरान संकट: NATO दूरी पर, अमेरिका में जनता नाराज़, 10 संकेतों में समझें पूरा मामला

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Javed Haider Zaidi

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ईरान युद्ध को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की नीति पर अमेरिका में विरोध, NATO की दूरी और बढ़ते संकट को दर्शाता प्रतीकात्मक चित्र

मध्य पूर्व में जारी तनाव अब वैश्विक राजनीति के साथ-साथ अमेरिकी घरेलू राजनीति को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। Donald Trump द्वारा ईरान के खिलाफ उठाया गया सैन्य कदम अब उनके लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है। जिस ऑपरेशन को तेज और सीमित बताया गया था, वह अब लंबा खिंचता दिख रहा है और इसके परिणाम अमेरिका के भीतर और बाहर दोनों जगह महसूस किए जा रहे हैं।

करीब तीन हफ्तों के भीतर यह संघर्ष केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक असंतोष, आर्थिक दबाव और कूटनीतिक अलगाव का कारण बन गया है। विशेषज्ञ इसे धीरे-धीरे ‘वॉर ट्रैप’ की स्थिति बताते हैं, जहां से निकलना आसान नहीं होता।

अमेरिका में बढ़ता जनविरोध

ईरान को लेकर अमेरिकी जनता का रुख लगातार सरकार के खिलाफ जाता दिख रहा है। Quinnipiac University के ताजा सर्वे के अनुसार करीब 59 प्रतिशत अमेरिकी इस युद्ध के खिलाफ हैं।
53 प्रतिशत लोग सैन्य कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं, जबकि 74 प्रतिशत नागरिकों ने साफ कहा है कि वे ग्राउंड ट्रूप्स भेजने के पक्ष में नहीं हैं।

इतना ही नहीं, बड़ी संख्या में लोगों का मानना है कि सरकार ने इस हमले के पीछे ठोस कारण स्पष्ट नहीं किए। इससे आम नागरिकों के बीच अविश्वास की स्थिति पैदा हो रही है।

कांग्रेस को नजरअंदाज करने पर विवाद

अमेरिका में यह मुद्दा भी तेजी से उठ रहा है कि क्या राष्ट्रपति को बिना कांग्रेस की मंजूरी के इस तरह की कार्रवाई करनी चाहिए थी। लगभग 59 प्रतिशत लोगों का मानना है कि पहले संसद की अनुमति लेना जरूरी था। इससे संवैधानिक बहस भी तेज हो गई है।

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राजनीतिक विभाजन और गहराया

ईरान मुद्दे पर अमेरिका के भीतर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद और बढ़ गए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी और कई स्वतंत्र नेता इस सैन्य कार्रवाई का खुलकर विरोध कर रहे हैं। इससे देश के भीतर राजनीतिक माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया है।

मीडिया सर्वे में भी नकारात्मक संकेत

The Washington Post के सर्वे के मुताबिक 42 प्रतिशत अमेरिकी चाहते हैं कि सैन्य कार्रवाई तुरंत रोक दी जाए, जबकि केवल 34 प्रतिशत लोग इसके जारी रहने के पक्ष में हैं।
करीब 53 प्रतिशत लोगों का मानना है कि यह युद्ध अमेरिका के हित में नहीं है।

इसके अलावा Marist Poll के सर्वे में भी 56 प्रतिशत लोगों ने इस युद्ध का विरोध किया है।

NATO की दूरी बढ़ना चिंता का विषय

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अमेरिका को उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिल रहा है। NATO के कई सदस्य देश इस संघर्ष में खुलकर साथ नहीं दे रहे।
यह स्थिति अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि ऐसे मामलों में सहयोगियों का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण होता है।

तेल बाजार पर असर और आर्थिक दबाव

ईरान संकट का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है।
अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका सीधा असर अमेरिकी नागरिकों की जेब पर भी पड़ सकता है, जिससे सरकार के खिलाफ असंतोष और बढ़ेगा।

‘फॉरएवर वॉर’ का वादा सवालों में

चुनाव के दौरान Donald Trump ने लंबे समय तक चलने वाले युद्धों को खत्म करने का वादा किया था। लेकिन मौजूदा हालात इसके बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संघर्ष लंबा खिंच सकता है, जो ट्रंप की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।

सैन्य रणनीति पर उठते सवाल

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि बिना स्पष्ट रणनीति और एग्जिट प्लान के शुरू किया गया कोई भी सैन्य अभियान लंबे समय तक जटिल होता जाता है।
ईरान जैसे क्षेत्र में यह जोखिम और ज्यादा बढ़ जाता है, जहां क्षेत्रीय राजनीति बेहद संवेदनशील है।

अंतरराष्ट्रीय दबाव और कूटनीतिक अलगाव

अमेरिका पर अब कूटनीतिक दबाव भी बढ़ रहा है। कई देश इस संघर्ष को टालने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं।
इससे अमेरिका की वैश्विक छवि पर भी असर पड़ सकता है।

चुनावी राजनीति पर असर

घरेलू विरोध, आर्थिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय असंतुलन का सीधा असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यह मुद्दा ट्रंप के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकता है।

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इजरायल-अमेरिका के हमले के बाद ईरान की कड़ी चेतावनी: खाड़ी देशों पर मंडराया विकिरण का खतरा

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ईरान के बुशहर परमाणु संयंत्र पर हमले के बाद मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव

मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने अब एक खतरनाक मोड़ ले लिया है। ईरान ने आरोप लगाया है कि उसके महत्वपूर्ण परमाणु संयंत्र पर बार-बार हमले किए जा रहे हैं, जिसके गंभीर परिणाम पूरे खाड़ी क्षेत्र को भुगतने पड़ सकते हैं।

बुशहर परमाणु संयंत्र पर हमले का दावा

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि इजरायल और अमेरिका ने ईरान के बुशहर परमाणु संयंत्र पर अब तक चार बार हमला किया है। उनका कहना है कि यदि इन हमलों के कारण रेडियोएक्टिव फॉलआउट (विकिरण का प्रसार) होता है, तो इसका असर ईरान की राजधानी तेहरान से ज्यादा खाड़ी देशों पर पड़ेगा।

खाड़ी देशों के लिए बड़ी चेतावनी

ईरान ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि संभावित विकिरण का असर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन, कतर और ओमान जैसे देशों की राजधानियों तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति में वहां “जीवन पूरी तरह समाप्त हो सकता है”, जो पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

ईरान का दावा: अमेरिका को हुआ नुकसान

ईरान ने यह भी दावा किया है कि उसने पिछले 24 घंटों में अमेरिकी सैन्य ताकत को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। ईरानी पक्ष के अनुसार, उन्होंने अमेरिका के दो फाइटर जेट, एक A-10 एयरक्राफ्ट, कई हेलीकॉप्टर, दो MQ-9 ड्रोन और कई क्रूज मिसाइलों को मार गिराया है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है।

पश्चिमी देशों पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप

अब्बास अराघची ने पश्चिमी देशों पर दोहरे मापदंड अपनाने का भी आरोप लगाया। उन्होंने ज़ापोरिज्जिया न्यूक्लियर पावर प्लांट का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की स्थिति पर पश्चिमी देशों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी, लेकिन ईरान के परमाणु संयंत्र पर हमलों को लेकर वही संवेदनशीलता नहीं दिखाई जा रही।

क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराता खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु संयंत्रों पर हमले न केवल सैन्य बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी बेहद खतरनाक होते हैं। यदि विकिरण फैलता है, तो इसका असर सीमाओं से परे जाकर लाखों लोगों के जीवन और स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

स्थायी समाधान की मांग

ईरान ने कहा है कि उस पर यह युद्ध थोपा गया है और वह इसका “स्थायी और सशर्त समाधान” चाहता है। ईरान के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि अस्थायी युद्धविराम से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि इसके लिए दीर्घकालिक रणनीति और कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं।

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