मिडिल-ईस्ट तनाव: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के माहौल का असर अब भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने मार्च महीने में अब तक भारतीय बाजार से भारी बिकवाली करते हुए 52,704 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। यह पिछले कुछ महीनों में सबसे बड़ी निकासी में से एक मानी जा रही है।
डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार मार्च में 13 तारीख तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार में बड़े पैमाने पर शेयर बेचकर अपना निवेश कम किया है। इससे पहले फरवरी में एफपीआई ने भारतीय बाजार में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था, जो करीब 17 महीनों में सबसे ज्यादा प्रवाह माना गया था। हालांकि उसके बाद वैश्विक परिस्थितियों में आए बदलाव के चलते निवेशकों का रुख अचानक बदल गया।
विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। इस क्षेत्र में संघर्ष की आशंका और होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर संभावित असर को लेकर निवेशकों की चिंता बढ़ी है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने लगी हैं। तेल की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के चालू खाते के घाटे, महंगाई और आर्थिक वृद्धि पर दबाव डाल सकती हैं। इसके साथ ही भारतीय रुपये में भी कमजोरी देखने को मिल रही है और यह डॉलर के मुकाबले 92 के आसपास बना हुआ है। कमजोर रुपये और बढ़ते बॉन्ड प्रतिफल की वजह से भी विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में बिकवाली कर रहे हैं।
पिछले कुछ महीनों के आंकड़े भी बताते हैं कि एफपीआई का रुख लगातार उतार-चढ़ाव भरा रहा है। जनवरी में विदेशी निवेशकों ने 35,962 करोड़ रुपये के शेयर बेचकर पैसा निकाला था। दिसंबर में यह आंकड़ा 22,611 करोड़ रुपये रहा, जबकि नवंबर में करीब 3,765 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज की गई थी। इस तरह देखा जाए तो बीते पांच महीनों में विदेशी निवेशकों की ओर से कई बार बड़ी बिकवाली देखने को मिली है।
विश्लेषकों के अनुसार भारत के अलावा अन्य एशियाई बाजार फिलहाल विदेशी निवेशकों को ज्यादा आकर्षित कर रहे हैं। जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वी. के. विजयकुमार का कहना है कि पिछले करीब डेढ़ साल में विकसित और अन्य उभरते बाजारों की तुलना में भारत में रिटर्न अपेक्षाकृत कमजोर रहे हैं। इसी वजह से निवेशक अब दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन जैसे बाजारों की ओर अधिक रुचि दिखा रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। इसके साथ ही रुपये की कमजोरी और तेल की ऊंची कीमतों ने भारत की आर्थिक वृद्धि और कॉरपोरेट आय पर असर पड़ने की आशंकाओं को भी बढ़ा दिया है। यही कारण है कि विदेशी निवेशकों की धारणा फिलहाल सतर्क बनी हुई है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में विदेशी निवेशकों का रुख काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है, तेल की कीमतों में स्थिरता आती है और रुपये की स्थिति मजबूत होती है, तो भारतीय बाजार में फिर से विदेशी निवेश की वापसी देखने को मिल सकती है।