पूर्वांचल में नई सियासी चाल: आजमगढ़ की महारैली से क्या बदलेंगे ओम प्रकाश राजभर के राजनीतिक समीकरण?

Picture of Javed Haider Zaidi

Javed Haider Zaidi

Share

आजमगढ़ में सामाजिक समरसता महारैली को संबोधित करते कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर, मंच पर समर्थकों की भीड़ और ब्राह्मण प्रतिनिधियों की मौजूदगी।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही अभी एक साल दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। इसी कड़ी में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष Om Prakash Rajbhar (ओम प्रकाश राजभर) ने पूर्वांचल में बड़ा शक्ति प्रदर्शन करने की तैयारी की है।

आजमगढ़ के अतरौलिया में आयोजित होने वाली ‘सामाजिक समरसता महारैली’ को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है। इस रैली को केवल एक जनसभा नहीं, बल्कि आने वाले चुनाव से पहले सियासी ताकत दिखाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

एक लाख भीड़ और दस हजार ब्राह्मणों का दावा

ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि इस महारैली में एक लाख से ज्यादा लोग शामिल होंगे। खास बात यह है कि उन्होंने दस हजार से अधिक ब्राह्मणों की भागीदारी का भी दावा किया है।

अब तक राजभर समाज और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों के नेता के रूप में पहचान रखने वाले राजभर इस रैली के जरिए खुद को सर्वसमाज का नेता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। ‘सामाजिक समरसता’ नाम देकर वे यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी राजनीति किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है।

ब्राह्मण वोट क्यों हैं अहम?

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 10 से 12 प्रतिशत मानी जाती है। हालांकि संख्या के हिसाब से यह बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से यह वर्ग काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्राह्मण मतदाता कई सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

Also Read

भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से ब्राह्मणों को अपना पारंपरिक समर्थन आधार मानती रही है। वहीं समाजवादी पार्टी भी हाल के वर्षों में ब्राह्मण सम्मेलन और धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए इस वर्ग को साधने की कोशिश कर चुकी है। बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस भी समय-समय पर ब्राह्मण हितों की बात करती रही हैं।

ऐसे में ओम प्रकाश राजभर का खुलकर ब्राह्मणों को अपनी रैली में जोड़ने का दावा करना राजनीतिक दृष्टि से बड़ा कदम माना जा रहा है।

ब्राह्मण असंतोष की चर्चा कैसे बढ़ी?

पिछले वर्ष विधानसभा सत्र के दौरान कुछ ब्राह्मण विधायकों की बैठक की तस्वीर सामने आने के बाद विपक्ष ने दावा किया था कि सत्ताधारी दल के ब्राह्मण विधायक असंतुष्ट हैं। हालांकि इस पर कोई बड़ा आधिकारिक बयान सामने नहीं आया, लेकिन इस घटना के बाद से ब्राह्मण राजनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं।

इसी पृष्ठभूमि में राजभर की यह महारैली और उसमें ब्राह्मणों की बड़ी भागीदारी का दावा राजनीतिक हलकों में अलग मायने रखता है।

पूर्वांचल में मजबूत पकड़

ओम प्रकाश राजभर को पूर्वांचल की राजनीति का प्रभावशाली चेहरा माना जाता है। वे अपनी बेबाक बयानबाजी और जमीनी संगठन के लिए जाने जाते हैं। गांव-गांव कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा कर उन्होंने सुभासपा को एक मजबूत क्षेत्रीय पहचान दिलाई है।

एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद वे समय-समय पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखते हैं। यही वजह है कि उनकी हर गतिविधि पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर रहती है।

रैली का असर कितना होगा?

अगर रैली में दावा के मुताबिक भारी भीड़ जुटती है और ब्राह्मणों की बड़ी संख्या दिखाई देती है, तो इसे राजभर की बड़ी राजनीतिक सफलता माना जाएगा। इससे पूर्वांचल में नए सामाजिक समीकरण बनने की चर्चा तेज हो सकती है।

हालांकि राजनीति में भीड़ और वोट का सीधा संबंध हमेशा नहीं होता। अगर भीड़ उम्मीद के मुताबिक नहीं पहुंची, तो विपक्ष इसे मुद्दा बना सकता है और राजभर की रणनीति पर सवाल उठा सकता है।

फिलहाल आजमगढ़ की इस महारैली पर सबकी नजर टिकी है। यह रैली तय कर सकती है कि क्या ओम प्रकाश राजभर वाकई पूर्वांचल में बड़ा राजनीतिक खेल करने की तैयारी में हैं या यह केवल चुनावी माहौल बनाने की कोशिश है। आने वाले दिनों में इसके संकेत साफ हो जाएंगे।

Next Post

जेडीयू अध्यक्ष पद के लिए नीतीश कुमार ने भरा नामांकन, 2028 तक तय होगा कार्यकाल; निर्विरोध चुनाव लगभग पक्का

Picture of Javed Haider Zaidi

Javed Haider Zaidi

Share

जेडीयू अध्यक्ष पद के लिए नीतीश कुमार का नामांकन दाखिल करते हुए संबंधित दस्तावेज जमा करते नेता और पार्टी कार्यकर्ता

जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर सियासी तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने उनकी ओर से दो सेट में नामांकन पत्र जमा किए। मौजूदा प्रक्रिया के अनुसार, नए अध्यक्ष का कार्यकाल 2028 तक रहेगा।

नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 22 मार्च निर्धारित की गई है, जबकि 23 मार्च को नामांकन पत्रों की जांच (स्क्रूटनी) होगी। यदि एक से अधिक उम्मीदवार मैदान में आते हैं, तो चुनाव की प्रक्रिया अपनाई जाएगी, अन्यथा नीतीश कुमार का निर्विरोध अध्यक्ष चुना जाना तय माना जा रहा है।

संगठनात्मक चुनाव पूरे, अब केवल औपचारिकता शेष

जेडीयू ने प्रदेश स्तर तक संगठनात्मक चुनाव पहले ही पूरे कर लिए हैं। अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया ही बची है। 24 मार्च नाम वापसी की अंतिम तारीख है, जिसके बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। फिलहाल किसी अन्य नेता द्वारा दावेदारी सामने नहीं आने से यह संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की कोई संभावना नहीं है।

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि संगठन के हर स्तर पर कार्यकर्ताओं की इच्छा है कि नीतीश कुमार ही पार्टी की कमान संभाले रखें। इससे साफ है कि जेडीयू फिलहाल अनुभव और स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है।

बिहार की राजनीति में नए संकेत

इस बीच बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत भी मिल रहे हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चाओं के बाद उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री सुर्खियों में है। साथ ही राज्य में नए मुख्यमंत्री को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस बार बिहार में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से मुख्यमंत्री बनने की संभावना जताई जा रही है। एनडीए सहयोगी चिराग पासवान भी सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से होना चाहिए।

इसी कड़ी में नीतीश कुमार कई मंचों से मौजूदा गृह मंत्री सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाते हुए दिखाई दिए हैं, जिसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

Next Post

Loading more posts...