सपा-बसपा गठबंधन: उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर एक बार हलचल तेज हो गई है। राजधानी लखनऊ में हाल ही में आयोजित ‘PDA प्रेम प्रसार समारोह’ में समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने बसपा के साथ संबंधों में गहराई आने के संकेत दिए हैं। इसके साथ ही बसपा के कद्दावर नेता नसीरुद्दीन सिद्दीकी के सपा में शामिल होने से सियासी गलियारों में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर नई अटकलें तेज हो गई हैं। यह वही सिद्दीकी हैं, जिन्होंने मायावती के शासन में चार बार मंत्री पद संभाला और 2017 में बसपा से निष्कासित होने के बाद अब सपा का दामन थामा है।
PDA मंच से अखिलेश का बड़ा संकेत
लखनऊ के समारोह में 15,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। अखिलेश यादव ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, “समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं और आने वाले समय में ये और भी गहरे होंगे।”
उन्होंने अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को राज्य की प्रगति का आधार बताया और इसे केवल चुनावी गठबंधन नहीं बल्कि एक स्थायी सामाजिक आंदोलन के रूप में पेश किया।
सपा में नसीरुद्दीन सिद्दीकी की एंट्री के मायने
पूर्व मंत्री सिद्दीकी का सपा में आना राजनीतिक स्तर पर बड़ा बदलाव माना जा रहा है। उनके साथ राजकुमार पाल जैसे अन्य नेता भी सपा में शामिल हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम सीधे तौर पर बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने और मायावती को एक ‘सॉफ्ट सिग्नल’ देने की रणनीति का हिस्सा है।
क्या मिट पाएंगी पुरानी दूरियां?
सपा और बसपा के रिश्तों का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने भाजपा को रोकने के लिए हाथ मिलाया था, लेकिन 1995 का ‘गेस्ट हाउस कांड’ इन दलों के बीच कड़वाहट का कारण बना। 2019 में दोनों दलों ने गठबंधन किया, लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। अब सवाल यह है कि क्या 2027 के लिए पुरानी दूरियां मिट सकती हैं।
दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति
अतीत में यादव वर्चस्व के कारण दलित वर्ग का बड़ा हिस्सा सपा से दूर हुआ था। हाल ही के लोकसभा चुनाव में अवधेश प्रसाद की जीत ने सपा के दलित वोट बैंक को पुनर्जीवित किया। अखिलेश अब इस वर्ग से दूरी हटाकर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सक्रिय हैं।
योगी सरकार पर प्रहार और शंकराचार्य विवाद
अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी परोक्ष हमला किया। उन्होंने शंकराचार्य विवाद का मुद्दा उठाते हुए कहा कि भाजपा सरकार परंपराओं पर सवाल उठा रही है। इस बयान से राजनीतिक तनाव और बढ़ा है और विपक्षी दल सक्रिय हो गए हैं।
क्या सजेगी फिर सपा-बसपा की बिसात?
अखिलेश यादव के बदलते सुर और बसपा के अनुभवी नेताओं का स्वागत यह संकेत देता है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण बदलने की तैयारी जोरों पर है। यदि यह रणनीति सफल होती है, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का नक्शा पूरी तरह बदल सकता है।