गलवान से सत्ता के गलियारों तक: जनरल नरवणे की किताब पर मचा सियासी भूचाल, राजनाथ सिंह ने तोड़ी चुप्पी

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Javed Haider Zaidi

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जनरल एमएम नरवणे की विवादित पुस्तक को लेकर बयान देते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गलवान घाटी और राष्ट्रीय सुरक्षा पर उठे सवालों की पृष्ठभूमि में प्रेस वार्ता का दृश्य

नई दिल्ली: पूर्व थलसेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे (जनरल एमएम नरवणे) की प्रस्तावित आत्मकथा को लेकर जारी विवाद के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह Rajnath Singh ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने उन खबरों का खंडन किया, जिनमें दावा किया गया था कि सेना से जुड़े अधिकारियों को रिटायरमेंट के 20 साल बाद तक कोई पुस्तक लिखने की अनुमति नहीं होगी। रक्षा मंत्री ने ऐसे दावों को “सरासर गलत” बताया और कहा कि पूर्व सेना प्रमुखों के लेखन पर कोई blanket ban नहीं है।

संसद में उठा था मामला

हालिया बजट सत्र के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी Rahul Gandhi ने सरकार से सवाल किया था कि जनरल नरवणे की किताब को प्रकाशन की अनुमति क्यों नहीं दी गई। इस मुद्दे पर संसद में तीखी बहस हुई और कार्यवाही प्रभावित हुई। विपक्ष का आरोप था कि सरकार संवेदनशील तथ्यों को सामने आने से रोक रही है, जबकि सरकार की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीयता के पहलुओं का हवाला दिया गया।

किताब में क्या है?

जनरल नरवणे मार्च 2020 से अप्रैल 2022 तक सेना प्रमुख रहे। उनके कार्यकाल के दौरान जून 2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसने दोनों देशों के संबंधों को नए मोड़ पर ला खड़ा किया।

बताया जाता है कि उनकी आत्मकथा “Four Stars of Destiny” में गलवान घाटी की घटना, उसके बाद सीमा पर सैन्य तैनाती, चीन के साथ डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया और उच्चस्तरीय बैठकों का सिलसिलेवार विवरण शामिल है। पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ हुई चर्चाओं का भी उल्लेख बताया गया है।

सूत्रों के अनुसार, पुस्तक में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) और चाइना स्टडी ग्रुप (CSG) की बैठकों का जिक्र भी है, जिससे इसे संवेदनशील माना गया।

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प्रकाशन पर रोक क्यों?

रक्षा मंत्रालय ने सीधे जनरल नरवणे की बजाय प्रकाशक से पुस्तक का पूरा ड्राफ्ट तलब किया। अप्रैल 2024 में प्रस्तावित प्रकाशन को अब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी है। सूत्रों का कहना है कि पुस्तक की सामग्री की समीक्षा ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA) और आर्मी एक्ट के प्रावधानों के तहत की जा रही है, ताकि कोई संवेदनशील सैन्य जानकारी सार्वजनिक न हो।

सरकारी सूत्रों का तर्क है कि सैन्य अभियानों, रणनीतिक चर्चाओं और उच्चस्तरीय निर्णयों से जुड़ी जानकारियों का सार्वजनिक होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। वहीं, लेखन की स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर भी बहस तेज है।

सरकार का रुख क्या संकेत देता है?

रक्षा मंत्री के बयान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि पूर्व सैन्य अधिकारियों पर सामान्य तौर पर किताब लिखने की कोई रोक नहीं है। हालांकि, यदि सामग्री राष्ट्रीय सुरक्षा या गोपनीय सूचनाओं से जुड़ी हो, तो उसकी जांच और अनुमोदन प्रक्रिया अनिवार्य है।

जनरल नरवणे की पुस्तक का अंतिम फैसला क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इस विवाद ने एक अहम सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे तय किया जाए।

यह मामला केवल एक किताब का नहीं, बल्कि सैन्य परंपराओं, गोपनीयता कानूनों और लोकतांत्रिक पारदर्शिता के बीच संतुलन की परीक्षा भी बन गया है।

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जेडीयू अध्यक्ष पद के लिए नीतीश कुमार ने भरा नामांकन, 2028 तक तय होगा कार्यकाल; निर्विरोध चुनाव लगभग पक्का

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जेडीयू अध्यक्ष पद के लिए नीतीश कुमार का नामांकन दाखिल करते हुए संबंधित दस्तावेज जमा करते नेता और पार्टी कार्यकर्ता

जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर सियासी तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने उनकी ओर से दो सेट में नामांकन पत्र जमा किए। मौजूदा प्रक्रिया के अनुसार, नए अध्यक्ष का कार्यकाल 2028 तक रहेगा।

नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 22 मार्च निर्धारित की गई है, जबकि 23 मार्च को नामांकन पत्रों की जांच (स्क्रूटनी) होगी। यदि एक से अधिक उम्मीदवार मैदान में आते हैं, तो चुनाव की प्रक्रिया अपनाई जाएगी, अन्यथा नीतीश कुमार का निर्विरोध अध्यक्ष चुना जाना तय माना जा रहा है।

संगठनात्मक चुनाव पूरे, अब केवल औपचारिकता शेष

जेडीयू ने प्रदेश स्तर तक संगठनात्मक चुनाव पहले ही पूरे कर लिए हैं। अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया ही बची है। 24 मार्च नाम वापसी की अंतिम तारीख है, जिसके बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। फिलहाल किसी अन्य नेता द्वारा दावेदारी सामने नहीं आने से यह संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की कोई संभावना नहीं है।

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि संगठन के हर स्तर पर कार्यकर्ताओं की इच्छा है कि नीतीश कुमार ही पार्टी की कमान संभाले रखें। इससे साफ है कि जेडीयू फिलहाल अनुभव और स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है।

बिहार की राजनीति में नए संकेत

इस बीच बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत भी मिल रहे हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चाओं के बाद उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री सुर्खियों में है। साथ ही राज्य में नए मुख्यमंत्री को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस बार बिहार में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से मुख्यमंत्री बनने की संभावना जताई जा रही है। एनडीए सहयोगी चिराग पासवान भी सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से होना चाहिए।

इसी कड़ी में नीतीश कुमार कई मंचों से मौजूदा गृह मंत्री सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाते हुए दिखाई दिए हैं, जिसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

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