रमजान के पाक महीने को आत्मसंयम, त्याग और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देने वाला बताते हुए ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि रोजा केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने नफ़्स (स्वयं) पर काबू पाने की एक रूहानी साधना है। उन्होंने कहा कि रमजान इंसान को भीतर से बदलने का महीना है—यह आत्ममंथन, आत्मसंयम और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने का अवसर देता है।
मौलाना ने कहा कि रमजान अल्लाह का महीना है, जिसमें मुसलमान 30 दिनों तक रोजा रखते हैं। लेकिन रोजे का असली उद्देश्य केवल दिनभर खाना-पीना छोड़ देना नहीं है। इसका मकसद यह है कि जब इंसान खुद भूख और प्यास की तकलीफ महसूस करता है, तो उसे उन लोगों का दर्द समझ में आता है जो रोजाना अभाव में जीते हैं। यह एहसास इंसान के भीतर करुणा और हमदर्दी पैदा करता है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम का संदेश स्पष्ट है—जरूरतमंद को आपके दरवाजे पर आने की नौबत न आए, बल्कि आप खुद उसके दरवाजे तक जाएं। उसकी जरूरतों का ख्याल रखें, उसके खाने-पीने और रहन-सहन की व्यवस्था में मदद करें। केवल रमजान में ही नहीं, बल्कि पूरे साल उसकी खबर लेते रहें। यही असली इबादत है और यही समाज को मजबूत बनाता है।
फितरा: बराबरी और सम्मान का संदेश
मौलाना यासूब अब्बास ने फितरा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ईद से पहले फितरा अदा करना वाजिब किया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि समाज का हर व्यक्ति, खासकर गरीब और जरूरतमंद, ईद की खुशियों में बराबरी से शामिल हो सके। फितरा केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और भाईचारे का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि फितरा की निर्धारित राशि ईद की नमाज से पहले जरूरतमंद तक पहुंचा दी जानी चाहिए, ताकि वह भी सम्मान के साथ ईद मना सके। इस परंपरा के पीछे यही भावना है कि समाज में कोई भी व्यक्ति खुद को अकेला या उपेक्षित महसूस न करे।
केवल भूखा रहना ही रमजान नहीं
मौलाना ने कहा कि अक्सर लोग यह समझ लेते हैं कि रमजान का मतलब सिर्फ दिनभर कुछ न खाना है। जबकि असल मायने इससे कहीं अधिक गहरे हैं। घर में तमाम नेमतें मौजूद होती हैं, लेकिन इंसान अपने आप पर नियंत्रण रखता है। यही त्याग है, यही सब्र है और यही असली रोजा है।
उन्होंने कहा कि रोजा इंसान को झूठ, गुस्से, बुरे विचार और गलत आचरण से भी दूर रहने की सीख देता है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ खाने-पीने से परहेज करे लेकिन उसके व्यवहार में बदलाव न आए, तो रोजे का असली मकसद अधूरा रह जाता है। रमजान का महीना इंसान को अपने अंदर झांकने और खुद को सुधारने का मौका देता है।
इंसानियत सबसे बड़ी इबादत
मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि इस्लाम केवल मुसलमानों की मदद करने की बात नहीं करता, बल्कि हर इंसान की सहायता करने की शिक्षा देता है। धर्म, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव किए बिना जरूरतमंद की मदद करना ही असली इंसानियत है।
उन्होंने कहा कि रमजान को नेकियों का मौसम इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस महीने में अच्छे कर्मों का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। यह महीना हमें यह सिखाता है कि हम अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर उठकर समाज के कमजोर वर्गों के लिए कुछ करें।