बिहार में बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया की लत को लेकर सरकार गंभीर हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार अब नाबालिगों को मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए नई नीति लाने की तैयारी में है।
विधानसभा में सोमवार को इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जानकारी दी कि राज्य सरकार ने बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निम्हांस) से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट मिलने के बाद सभी संबंधित विभागों और हितधारकों के साथ बैठक कर ठोस नीति तैयार की जाएगी।
सदन में उठा ‘अदृश्य महामारी’ का मुद्दा
प्रश्नकाल के दौरान जदयू विधायक समृद्ध वर्मा ने बच्चों के बीच बढ़ती डिजिटल लत को “अदृश्य महामारी” बताया। उन्होंने कहा कि आकर्षक खिलौनों और किताबों की जगह अब लंबे समय तक मोबाइल स्क्रीन पर स्क्रॉलिंग ने ले ली है।
विधायक ने आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का हवाला देते हुए कहा कि यह समस्या अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि संभावित स्वास्थ्य संकट का रूप ले रही है। उन्होंने चेताया कि लगातार स्क्रीन उपयोग से बच्चों में एकाग्रता की कमी, व्यवहार में बदलाव और वास्तविक जीवन से दूरी बढ़ रही है।
‘डोपामाइन प्रभाव’ और डिजिटल साक्षरता पर चिंता
सदन में यह भी कहा गया कि मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के मस्तिष्क में डोपामाइन के स्तर को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे वास्तविक गतिविधियां उन्हें नीरस लगने लगती हैं। बिहार में इंटरनेट की पहुंच तेजी से बढ़ी है, लेकिन डिजिटल साक्षरता का स्तर अभी भी अपेक्षाकृत कम है।
विधायक ने सवाल उठाया कि जब बच्चों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीक सिखाई जा रही है, तो उन्हें डिजिटल खतरों से बचाने की व्यवस्थित शिक्षा क्यों नहीं दी जा रही।
‘डिजिटल हाइजीन’ को पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव
समृद्ध वर्मा ने राज्य सरकार से सभी सरकारी स्कूलों में ‘डिजिटल हाइजीन’ को अनिवार्य पाठ के रूप में शामिल करने की मांग की। इसके अलावा प्रत्येक जिला अस्पताल में ‘लत परामर्श केंद्र’ (एडिक्शन काउंसिलिंग सेंटर) स्थापित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्क्रीन टाइम प्रबंधन के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए जीविका दीदी नेटवर्क का उपयोग करने का सुझाव भी दिया गया।
सरकार का क्या है अगला कदम?
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्रेयसी सिंह ने पुष्टि की कि निम्हांस से विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट मांगी गई है। रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद विभाग ठोस और व्यावहारिक नीति का मसौदा तैयार करेगा।
सरकार का मानना है कि यह बहु-क्षेत्रीय मुद्दा है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, आईटी और सामाजिक कल्याण विभागों की संयुक्त भागीदारी आवश्यक होगी।