इस्लामाबाद: पाकिस्तान की न्यायपालिका से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। Islamabad High Court ने अपने ही एक जज, जस्टिस तारिक महमूद जहांगीरी, को पद से हटाने का 116 पन्नों का विस्तृत फैसला जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि उनकी नियुक्ति गैरकानूनी थी, क्योंकि उनके पास वैध LLB डिग्री ही नहीं थी।
यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब पता चलता है कि जहांगीरी करीब 5 साल तक हाईकोर्ट में जज रहे और इससे पहले लगभग 30 साल तक कानूनी करियर चलाते रहे।
कैसे खुली फर्जी डिग्री की परतें?
पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सरदार मुहम्मद सरफराज डोगर और जस्टिस मुहम्मद आजम खान की बेंच ने की। अदालत ने फैसला कराची यूनिवर्सिटी के आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर सुनाया।
फैसले में सामने आया कि:
- 1988 में जहांगीरी ने LLB पार्ट-1 की परीक्षा फर्जी एनरोलमेंट नंबर से दी।
- 1989 में उन्हें नकल करते पकड़ा गया और तीन साल के लिए बैन कर दिया गया।
- सजा स्वीकार करने के बजाय उन्होंने 1990 में “तारिक जहांगीरी” नाम से फिर परीक्षा दी।
- इस बार उन्होंने एक ऐसा एनरोलमेंट नंबर इस्तेमाल किया, जो किसी अन्य छात्र इम्तियाज अहमद के नाम पर था।
- LLB पार्ट-2 की परीक्षा अपने असली नाम से दी, लेकिन अलग एनरोलमेंट नंबर का इस्तेमाल किया।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि एक कोर्स के लिए दो अलग-अलग एनरोलमेंट नंबर मिलना असंभव है। इसलिए उनकी मार्कशीट और डिग्री दोनों को अमान्य घोषित कर दिया गया।
कॉलेज ने भी नहीं माना छात्र
गवर्नमेंट इस्लामिया लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल ने अदालत को बताया कि जहांगीरी को कभी कॉलेज में विधिवत दाखिला ही नहीं मिला था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “जो चीज शुरुआत से ही अवैध हो, उसे बाद में किसी प्रशासनिक आदेश से वैध नहीं बनाया जा सकता।”
2020 में बने जज, 2024 में शुरू हुआ विवाद
जस्टिस तारिक महमूद जहांगीरी को 30 दिसंबर 2020 को Islamabad High Court का जज नियुक्त किया गया था।
साल 2024 में उनकी डिग्री को लेकर सवाल उठे। सितंबर 2024 में उन्हें न्यायिक कार्य से रोक दिया गया था। अब अंतिम फैसले में उनकी नियुक्ति को पूरी तरह अवैध करार देते हुए पद से हटा दिया गया है।
न्याय व्यवस्था पर बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की डिग्री तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी उठता है कि बिना वैध कानून की डिग्री के कोई व्यक्ति तीन दशक तक वकालत कैसे करता रहा और फिर हाईकोर्ट का जज कैसे बन गया?
पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था में यह फैसला एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जहां अदालत ने अपने ही जज की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए कानून की सर्वोच्चता को प्राथमिकता दी है।