UGC के नए नियमों के खिलाफ लखनऊ में सड़कों पर उतरा सवर्ण समाज
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शनिवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों और विभिन्न सामाजिक मंचों के आह्वान पर बड़ी संख्या में लोग परिवर्तन चौक पर एकत्र हुए और नए नियमों को “भेदभावपूर्ण” बताते हुए उन्हें वापस लेने की मांग की।
प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां लेकर ‘काला कानून वापस लो’ और ‘समानता सबके लिए’ जैसे नारे लगाए। आंदोलन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन भीड़ की संख्या को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, RAF की तैनाती
संवेदनशीलता को देखते हुए लखनऊ पुलिस ने पहले से ही व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। परिवर्तन चौक और आसपास के इलाकों में बैरिकेडिंग की गई थी। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के नेतृत्व में भारी पुलिस बल तैनात रहा। इसके अलावा रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की भी मौजूदगी रही ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
ट्रैफिक व्यवस्था पर भी असर पड़ा और कई मार्गों को अस्थायी रूप से डायवर्ट किया गया। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन की अनुमति निर्धारित शर्तों के साथ दी गई थी और कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता है।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद का केंद्र UGC द्वारा जारी किए गए नए नियम हैं, जिनमें उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा और उससे संबंधित संस्थागत सुरक्षा प्रावधानों को परिभाषित किया गया है।
याचिकाकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव को मुख्यतः अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित कर दिया गया है। उनका कहना है कि इससे सामान्य वर्ग के लोगों को संस्थागत संरक्षण से बाहर कर दिया गया है, जो समानता के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है।
सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का तर्क है कि किसी भी प्रकार का भेदभाव, चाहे वह किसी भी वर्ग के साथ हो, उसे समान रूप से परिभाषित और संबोधित किया जाना चाहिए।
मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, नियमों पर अंतरिम रोक
इस मुद्दे को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों से याचिकाएं दायर की गईं, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान नए नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है।
शीर्ष अदालत ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि नियमों की भाषा अस्पष्ट प्रतीत होती है और इनके दूरगामी सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी नियम का प्रभाव समाज को विभाजित करने वाला हो, तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अदालत ने केंद्र सरकार और UGC से 19 मार्च तक जवाब मांगा है।
2012 के विनियम बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने नियम 3(1)(सी) के उस हिस्से पर रोक लगाई, जिसमें सामान्य वर्ग को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखने की बात कही गई थी। इसके साथ ही अदालत ने UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2012 को अगली सुनवाई तक लागू रखने का निर्देश दिया।
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए अदालत ने कहा कि जब तक अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक 2012 के नियम प्रभावी रहेंगे।
देश के अन्य हिस्सों में भी विरोध
लखनऊ का प्रदर्शन कोई अलग घटना नहीं है। इससे पहले उत्तर प्रदेश सहित देश के कई शहरों में इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन हो चुके हैं। कई छात्र संगठनों, सामाजिक समूहों और शिक्षकों ने भी अलग-अलग मंचों से अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।
हालांकि कुछ संगठनों ने नए नियमों का समर्थन भी किया है और इसे सामाजिक न्याय की दिशा में कदम बताया है। यही वजह है कि यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक बहस का विषय बन गया है।
आगे की राह
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक के चलते नए नियम लागू नहीं हैं, लेकिन अंतिम फैसला आने तक यह मुद्दा चर्चा में बना रहेगा।
लखनऊ में हुआ यह प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि शिक्षा और समानता से जुड़े मामलों में समाज के विभिन्न वर्ग बेहद संवेदनशील हैं। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि UGC के नए नियमों का भविष्य क्या होगा।