संवैधानिक व्यवस्था पर सवाल: उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस सामने आई है। बरेली के निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट एवं प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री (Alankar Agnihotri) ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की मांग करते हुए जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय के बाहर शांतिपूर्ण धरना दिया। उनका यह कदम केवल व्यक्तिगत निलंबन के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े व्यापक प्रश्नों को उजागर करता है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल
धरने के दौरान अलंकार अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि उनके साथ जाति के आधार पर अपमानजनक व्यवहार किया गया। उन्होंने कहा कि एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उनका यह अधिकार है कि वे यह जान सकें कि किसके निर्देश पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई और किन परिस्थितियों में निर्णय लिया गया। उनके अनुसार, यह मामला प्रशासनिक मर्यादा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
राष्ट्रपति शासन की मांग का आधार
PCS अधिकारी का कहना है कि प्रदेश में प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता का अभाव दिखाई दे रहा है, जिससे जनता का भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा परिस्थितियों में संवैधानिक व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्ष प्रशासन और कानून व्यवस्था को मजबूती मिल सके।
निलंबन के बाद इस्तीफा और आरोप
निलंबन के पश्चात अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा देने की जानकारी दी। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला मजिस्ट्रेट के कैंप कार्यालय में उनके खिलाफ एक सुनियोजित साजिश रची गई। उनके मुताबिक, उन्हें कथित तौर पर पूरी रात कार्यालय में रोके रखने के निर्देश दिए गए थे, ताकि उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा सके।
कथित बंधक बनाए जाने का दावा
अलंकार अग्निहोत्री का कहना है कि जब उन्हें इस संभावित साजिश की जानकारी मिली, तो उन्होंने विधिक प्रतिनिधियों और मीडिया को सूचित किया। उनका दावा है कि मामले के सार्वजनिक होते ही उन्हें कार्यालय से जाने की अनुमति दी गई। इस पूरे घटनाक्रम को उन्होंने प्रशासनिक दबाव का उदाहरण बताया।
SIT जांच और न्यायिक मार्ग
PCS अधिकारी ने मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) के गठन की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि फोन पर हुई कथित बातचीत और प्रशासनिक आदेशों की जांच होनी चाहिए। साथ ही, निलंबन आदेश को न्यायालय में चुनौती देने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है।
व्यापक प्रशासनिक और सामाजिक संदर्भ
यह प्रकरण केवल एक अधिकारी और प्रशासन के बीच विवाद का विषय नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला प्रशासनिक स्वतंत्रता, जवाबदेही, और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण से जुड़ा है। ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच और स्पष्ट संवाद ही संस्थाओं पर जनता के भरोसे को बनाए रख सकते हैं।