संवैधानिक व्यवस्था पर सवाल: निलंबित PCS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री का विरोध और राष्ट्रपति शासन की मांग

Picture of Javed Haider Zaidi

Javed Haider Zaidi

Share

बरेली में निलंबित PCS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री जिला कलेक्ट्रेट के बाहर धरने पर बैठे हुए, प्रशासनिक व्यवस्था और राष्ट्रपति शासन की मांग से जुड़ा मामला

संवैधानिक व्यवस्था पर सवाल: उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस सामने आई है। बरेली के निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट एवं प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री (Alankar Agnihotri) ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की मांग करते हुए जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय के बाहर शांतिपूर्ण धरना दिया। उनका यह कदम केवल व्यक्तिगत निलंबन के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े व्यापक प्रश्नों को उजागर करता है।

प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल

धरने के दौरान अलंकार अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि उनके साथ जाति के आधार पर अपमानजनक व्यवहार किया गया। उन्होंने कहा कि एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उनका यह अधिकार है कि वे यह जान सकें कि किसके निर्देश पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई और किन परिस्थितियों में निर्णय लिया गया। उनके अनुसार, यह मामला प्रशासनिक मर्यादा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

राष्ट्रपति शासन की मांग का आधार

PCS अधिकारी का कहना है कि प्रदेश में प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता का अभाव दिखाई दे रहा है, जिससे जनता का भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा परिस्थितियों में संवैधानिक व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्ष प्रशासन और कानून व्यवस्था को मजबूती मिल सके।

निलंबन के बाद इस्तीफा और आरोप

निलंबन के पश्चात अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा देने की जानकारी दी। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला मजिस्ट्रेट के कैंप कार्यालय में उनके खिलाफ एक सुनियोजित साजिश रची गई। उनके मुताबिक, उन्हें कथित तौर पर पूरी रात कार्यालय में रोके रखने के निर्देश दिए गए थे, ताकि उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा सके।

कथित बंधक बनाए जाने का दावा

अलंकार अग्निहोत्री का कहना है कि जब उन्हें इस संभावित साजिश की जानकारी मिली, तो उन्होंने विधिक प्रतिनिधियों और मीडिया को सूचित किया। उनका दावा है कि मामले के सार्वजनिक होते ही उन्हें कार्यालय से जाने की अनुमति दी गई। इस पूरे घटनाक्रम को उन्होंने प्रशासनिक दबाव का उदाहरण बताया।

Also Read

SIT जांच और न्यायिक मार्ग

PCS अधिकारी ने मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) के गठन की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि फोन पर हुई कथित बातचीत और प्रशासनिक आदेशों की जांच होनी चाहिए। साथ ही, निलंबन आदेश को न्यायालय में चुनौती देने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है।

व्यापक प्रशासनिक और सामाजिक संदर्भ

यह प्रकरण केवल एक अधिकारी और प्रशासन के बीच विवाद का विषय नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला प्रशासनिक स्वतंत्रता, जवाबदेही, और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण से जुड़ा है। ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच और स्पष्ट संवाद ही संस्थाओं पर जनता के भरोसे को बनाए रख सकते हैं।

Next Post

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: 118 सांसदों के हस्ताक्षर, राहुल गांधी के साइन न होने पर उठे सवाल

Picture of Javed Haider Zaidi

Javed Haider Zaidi

Share

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस, 118 सांसदों के हस्ताक्षर, राहुल गांधी के साइन न होने पर राजनीतिक चर्चा

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा सचिवालय में सौंप दिया है। इस प्रस्ताव पर कुल 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि, इस पूरी कवायद में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय यह रहा कि नेता विपक्ष राहुल गांधी के हस्ताक्षर इस नोटिस में शामिल नहीं हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों ने भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

विपक्षी सांसदों ने संविधान के अनुच्छेद 94(सी) के तहत यह नोटिस दिया है। आरोप है कि लोकसभा स्पीकर का रवैया सदन के संचालन में भेदभावपूर्ण रहा है और विपक्ष को बार-बार बोलने से रोका गया। नोटिस में स्पीकर के आचरण को लेकर चार प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख किया गया है।

विपक्ष का कहना है कि 2 फरवरी को नेता विपक्ष राहुल गांधी को सदन में बोलने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद 3 फरवरी को विपक्ष के आठ सांसदों को निलंबित किया गया, जिसे एकतरफा कार्रवाई बताया गया है। 4 फरवरी को सत्ता पक्ष के एक सांसद द्वारा दो पूर्व प्रधानमंत्रियों पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी का भी जिक्र नोटिस में है। आरोप है कि विपक्ष की आपत्ति के बावजूद उस टिप्पणी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके साथ ही स्पीकर द्वारा विपक्षी महिला सांसदों को लेकर की गई टिप्पणी को भी आपत्तिजनक बताया गया है।

हालांकि प्रस्ताव लाने वाले सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे व्यक्तिगत रूप से लोकसभा स्पीकर का सम्मान करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि सदन के संचालन में निष्पक्षता और संतुलन की कमी दिखाई दी है। नोटिस मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर ने सचिव जनरल को इसकी जांच करने और नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कहा कि विपक्ष के पास संख्या बल न होने के बावजूद यह प्रस्ताव एक संदेश देने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार है और चेयर से अपेक्षा होती है कि वह सभी सांसदों के साथ समान व्यवहार करे।

राहुल गांधी के हस्ताक्षर न होने को लेकर पूछे गए सवाल पर मोहम्मद जावेद ने कहा कि भले ही राहुल गांधी ने साइन नहीं किए हों, लेकिन 118 सांसदों का समर्थन अपने आप में एक मजबूत संदेश है। वहीं टीएमसी के समर्थन को लेकर उन्होंने कहा कि पार्टी के सांसदों के हस्ताक्षर भले ही नोटिस पर न हों, लेकिन वे विपक्ष के साथ खड़े हैं।

Next Post

Loading more posts...