Aravalli: देश की सर्वोच्च अदालत ने अरावली हिल्स को लेकर चल रहे विवाद में नया मोड़ लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गहन समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की है। अदालत ने अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को तय की है। यह कदम पर्यावरण और जलवायु संरक्षण के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अरावली हिल्स और रेंज की परिभाषा को लेकर विवाद पिछले कई वर्षों से चल रहा है। मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि समिति अरावली क्षेत्र की भू-आकृति, खनन की सीमाओं और संरक्षण उपायों की पूरी समीक्षा करेगी। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को विस्तृत जवाब देने का निर्देश भी दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का पिछला निर्णय और रोक
20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा प्रस्तावित वैज्ञानिक परिभाषा को मंजूरी दी थी। इस पर कहा गया था कि 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली भू-आकृतियों को ही “अरावली हिल” माना जाएगा और इन पर होने वाले खनन और अवैध निर्माण पर सख्ती से नियंत्रण होगा।
लेकिन अब अदालत ने उस फैसले पर रोक लगा दी है और मामले को विस्तृत जांच के लिए विशेषज्ञ समिति के पास भेज दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही अंतिम दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।
विशेषज्ञ समिति की जिम्मेदारियाँ
विशेषज्ञ समिति की जिम्मेदारियों में शामिल हैं:
- अरावली हिल्स की भू-आकृति और पारिस्थितिकी का विस्तृत अध्ययन
- खनन और निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण के सुझाव
- जल स्रोतों और जैव विविधता की सुरक्षा के लिए उपाय सुझाना
- राज्यों और केंद्र सरकार के लिए नीति निर्धारण में मदद
इस समिति में पर्यावरण विशेषज्ञ, भूविज्ञानी, जल संसाधन विशेषज्ञ और वन संरक्षण अधिकारी शामिल हैं।
अरावली हिल्स का पर्यावरणीय महत्व
अरावली हिल्स को केवल प्राकृतिक सौंदर्य के लिए नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और जलवायु नियंत्रण के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान और हरियाणा के रेगिस्तानी फैलाव को रोकने में मदद करता है। इसके अलावा, अरावली हिल्स की ढलानों पर स्थित जंगल और वनस्पति जलस्तर को बनाए रखने में मदद करती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली हिल्स की संरचना और संरक्षण केवल कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय महत्व का पर्यावरणीय मामला है। अवैध खनन, निर्माण और अन्य गतिविधियाँ इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे में डाल सकती हैं।
राजनीतिक और सामाजिक पहलू
अरावली हिल्स को लेकर राज्य और केंद्र सरकारों के बीच कई बार विवाद हो चुका है। स्थानीय समुदाय, पर्यावरण संगठन और नागरिक समाज लगातार इस मामले पर निगरानी रख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की विशेषज्ञ समिति से उम्मीद की जा रही है कि यह न केवल कानूनी समाधान प्रदान करेगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों का भी संतुलन बनाएगी।
अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को
Supreme court (उच्चतम न्यायालय) ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी, जिसमें समिति की रिपोर्ट और राज्यों की प्रतिक्रिया पर विचार किया जाएगा। पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों का कहना है कि इस सुनवाई का परिणाम देश के पर्यावरण संरक्षण और जलवायु सुरक्षा के दृष्टिकोण से निर्णायक साबित होगा।