‘नेहरू ने किया था सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण का विरोध’, BJP सांसद ने साझा किया पाकिस्तान को लिखा पत्र, सियासी बहस तेज

Picture of Javed Haider Zaidi

Javed Haider Zaidi

Share

सोमनाथ मंदिर और पंडित जवाहरलाल नेहरू की तस्वीर, सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण को लेकर उठी राजनीतिक बहस

सोमनाथ मंदिर को लेकर एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। बीजेपी सांसद और राज्यसभा सदस्य Sudhanshu Trivedi (सुधांशु त्रिवेदी) ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक ऐतिहासिक पत्र को सार्वजनिक किया है। यह पत्र कथित तौर पर नेहरू द्वारा 1951 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को लिखा गया था।

बीजेपी सांसद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सिलसिलेवार पोस्ट करते हुए दावा किया कि आज़ाद भारत में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर सबसे नकारात्मक रुख खुद पंडित नेहरू का था। उनका कहना है कि जहां इतिहास में सोमनाथ मंदिर विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों का शिकार हुआ, वहीं स्वतंत्र भारत में इसके प्रतीकात्मक महत्व को कमजोर करने का प्रयास किया गया।

पीएम मोदी के लेख के बाद फिर उठा सोमनाथ का मुद्दा

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में सोमनाथ मंदिर विध्वंस के 100 वर्ष पूरे होने पर एक लेख लिखा था। इसके बाद से ही सोमनाथ मंदिर का विषय एक बार फिर सियासी चर्चा के केंद्र में आ गया है। अब बीजेपी द्वारा नेहरू से जुड़े दस्तावेज सामने लाए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई है।

पाकिस्तान को लिखे पत्र का दावा

सुधांशु त्रिवेदी के अनुसार, 21 अप्रैल 1951 को नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र लिखकर सोमनाथ मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को “पूरी तरह मिथक” बताया था। सांसद का आरोप है कि इस पत्र के जरिए नेहरू ने न केवल मंदिर के पुनर्निर्माण से दूरी बनाई, बल्कि पाकिस्तान को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि भारत में इस विषय को कोई आधिकारिक समर्थन नहीं है।

पुनर्निर्माण के खिलाफ थे नेहरू?

बीजेपी सांसद ने अपने दूसरे पोस्ट में दावा किया कि नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और कई कैबिनेट मंत्रियों को पत्र लिखकर पुनर्निर्माण पर आपत्ति जताई थी।

Also Read

इतना ही नहीं, नेहरू ने राष्ट्रपति को मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल न होने की सलाह दी थी। सांसद का कहना है कि नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर यह भी कहा था कि सोमनाथ मंदिर का निर्माण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।

मीडिया कवरेज सीमित करने के आरोप

सुधांशु त्रिवेदी ने यह भी दावा किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री को निर्देश दिए थे कि सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और उद्घाटन समारोह की मीडिया कवरेज को सीमित रखा जाए, ताकि इसे राष्ट्रीय पहचान से न जोड़ा जाए।

किसी भी तरह की मदद से किया इनकार

अपने तीसरे पोस्ट में बीजेपी सांसद ने आरोप लगाया कि नेहरू ने भारतीय दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट की किसी भी तरह की सहायता करने से मना कर दिया था। यहां तक कि पवित्र नदियों से जल मंगाने जैसी मांगों को भी ठुकरा दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति के सोमनाथ दौरे के प्रभाव को कम करने की कोशिश की गई और विदेश मंत्रालय के जरिए मंदिर से जुड़े प्रतीकात्मक आयोजनों को जानबूझकर सीमित रखा गया।

राजनीतिक हलकों में हलचल

इन आरोपों के सामने आने के बाद एक बार फिर पंडित नेहरू की धर्मनिरपेक्ष सोच, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और आज़ादी के बाद की नीतियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हालांकि, कांग्रेस पार्टी की ओर से अब तक इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

सोमनाथ मंदिर का मुद्दा एक बार फिर इतिहास, राजनीति और विचारधारा के संगम पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जिस पर आने वाले दिनों में सियासी तापमान और बढ़ने की संभावना है।

Next Post

जेडीयू अध्यक्ष पद के लिए नीतीश कुमार ने भरा नामांकन, 2028 तक तय होगा कार्यकाल; निर्विरोध चुनाव लगभग पक्का

Picture of Javed Haider Zaidi

Javed Haider Zaidi

Share

जेडीयू अध्यक्ष पद के लिए नीतीश कुमार का नामांकन दाखिल करते हुए संबंधित दस्तावेज जमा करते नेता और पार्टी कार्यकर्ता

जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर सियासी तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने उनकी ओर से दो सेट में नामांकन पत्र जमा किए। मौजूदा प्रक्रिया के अनुसार, नए अध्यक्ष का कार्यकाल 2028 तक रहेगा।

नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 22 मार्च निर्धारित की गई है, जबकि 23 मार्च को नामांकन पत्रों की जांच (स्क्रूटनी) होगी। यदि एक से अधिक उम्मीदवार मैदान में आते हैं, तो चुनाव की प्रक्रिया अपनाई जाएगी, अन्यथा नीतीश कुमार का निर्विरोध अध्यक्ष चुना जाना तय माना जा रहा है।

संगठनात्मक चुनाव पूरे, अब केवल औपचारिकता शेष

जेडीयू ने प्रदेश स्तर तक संगठनात्मक चुनाव पहले ही पूरे कर लिए हैं। अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया ही बची है। 24 मार्च नाम वापसी की अंतिम तारीख है, जिसके बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। फिलहाल किसी अन्य नेता द्वारा दावेदारी सामने नहीं आने से यह संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की कोई संभावना नहीं है।

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि संगठन के हर स्तर पर कार्यकर्ताओं की इच्छा है कि नीतीश कुमार ही पार्टी की कमान संभाले रखें। इससे साफ है कि जेडीयू फिलहाल अनुभव और स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है।

बिहार की राजनीति में नए संकेत

इस बीच बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत भी मिल रहे हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चाओं के बाद उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री सुर्खियों में है। साथ ही राज्य में नए मुख्यमंत्री को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस बार बिहार में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से मुख्यमंत्री बनने की संभावना जताई जा रही है। एनडीए सहयोगी चिराग पासवान भी सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से होना चाहिए।

इसी कड़ी में नीतीश कुमार कई मंचों से मौजूदा गृह मंत्री सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाते हुए दिखाई दिए हैं, जिसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

Next Post

Loading more posts...