मालेगांव में बदला सत्ता का समीकरण: ISLAM पार्टी की नसरीन शेख बनीं मेयर, कांग्रेस-सपा के समर्थन से AIMIM को झटका

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Javed Haider Zaidi

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मालेगांव नगर निगम मेयर चुनाव में ISLAM पार्टी की उम्मीदवार नसरीन शेख कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के समर्थन से मेयर निर्वाचित, नगर निगम में बदले सत्ता के समीकरण की तस्वीर

महाराष्ट्र के मालेगांव नगर निगम में मेयर चुनाव के नतीजों ने शहर की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। लंबे समय से चली आ रही सियासी खींचतान के बाद ISLAM पार्टी की उम्मीदवार नसरीन शेख Nasreen Bano Sheikh को मालेगांव की नई मेयर घोषित किया गया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के समर्थन से ISLAM पार्टी ने बहुमत का आंकड़ा पूरा किया, जिससे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) को बड़ा झटका लगा है।

बहुमत का खेल और बदलता समीकरण

84 सदस्यीय मालेगांव महानगरपालिका में किसी भी पार्टी या गठबंधन को सत्ता में आने के लिए 43 पार्षदों का समर्थन जरूरी था। नगर निगम चुनाव में ISLAM पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और उसके खाते में 35 नगरसेवक आए थे। हालांकि, यह संख्या स्पष्ट बहुमत से कम थी, जिसके चलते पार्टी को सहयोगी दलों की तलाश करनी पड़ी।

मेयर चुनाव से पहले ISLAM पार्टी ने AIMIM से भी समर्थन की संभावना टटोली थी। दोनों दलों के बीच बातचीत हुई, लेकिन कुछ राजनीतिक और रणनीतिक मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई। इसके बाद ISLAM पार्टी ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से संपर्क साधा, जहां से उसे अपेक्षित समर्थन मिल गया।

कांग्रेस और सपा का समर्थन बना निर्णायक

मेयर चुनाव में समाजवादी पार्टी के 5 और कांग्रेस के 3 नगरसेवकों ने ISLAM पार्टी का साथ दिया। इस तरह कुल समर्थन 43 पार्षदों तक पहुंच गया और नसरीन शेख को मेयर पद के लिए निर्वाचित घोषित कर दिया गया। यह समर्थन न सिर्फ संख्या के लिहाज से अहम था, बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी काफी मायने रखता है।

अन्य दलों की स्थिति

अगर नगर निगम में अन्य दलों की स्थिति पर नजर डालें तो AIMIM के पास 21 पार्षद हैं, शिवसेना के 18 और भाजपा के सिर्फ 2 नगरसेवक हैं। मजबूत संख्या होने के बावजूद AIMIM बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा सकी, जबकि शिवसेना और भाजपा की सीमित उपस्थिति के चलते वे सत्ता की दौड़ में निर्णायक भूमिका नहीं निभा सके। विपक्षी दलों के बंटे हुए संख्याबल का सीधा फायदा ISLAM पार्टी को मिला।

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नसरीन शेख के सामने चुनौतियां

नसरीन शेख के मेयर बनने के बाद अब सभी की नजरें उनके नेतृत्व पर टिकी हैं। मालेगांव जैसे बड़े और संवेदनशील शहर में बुनियादी सुविधाएं, साफ-सफाई, सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे हमेशा चर्चा में रहते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नई मेयर के सामने विकास कार्यों को गति देना और सभी वर्गों का विश्वास जीतना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

AIMIM के लिए राजनीतिक झटका

इस चुनाव परिणाम को AIMIM के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। पार्टी की नगर निगम में मजबूत उपस्थिति के बावजूद सत्ता से बाहर रहना उसके लिए आत्ममंथन का विषय बन सकता है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में AIMIM अपनी रणनीति और गठबंधन राजनीति पर दोबारा विचार कर सकती है।

मालेगांव की राजनीति में नया अध्याय

मेयर चुनाव के नतीजों के साथ ही मालेगांव नगर निगम में एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत हो गई है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और ISLAM पार्टी के इस गठबंधन को लेकर शहर की जनता में भी उत्सुकता है कि आने वाले समय में नगर निगम किस दिशा में काम करेगा।

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: 118 सांसदों के हस्ताक्षर, राहुल गांधी के साइन न होने पर उठे सवाल

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लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस, 118 सांसदों के हस्ताक्षर, राहुल गांधी के साइन न होने पर राजनीतिक चर्चा

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा सचिवालय में सौंप दिया है। इस प्रस्ताव पर कुल 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि, इस पूरी कवायद में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय यह रहा कि नेता विपक्ष राहुल गांधी के हस्ताक्षर इस नोटिस में शामिल नहीं हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों ने भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

विपक्षी सांसदों ने संविधान के अनुच्छेद 94(सी) के तहत यह नोटिस दिया है। आरोप है कि लोकसभा स्पीकर का रवैया सदन के संचालन में भेदभावपूर्ण रहा है और विपक्ष को बार-बार बोलने से रोका गया। नोटिस में स्पीकर के आचरण को लेकर चार प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख किया गया है।

विपक्ष का कहना है कि 2 फरवरी को नेता विपक्ष राहुल गांधी को सदन में बोलने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद 3 फरवरी को विपक्ष के आठ सांसदों को निलंबित किया गया, जिसे एकतरफा कार्रवाई बताया गया है। 4 फरवरी को सत्ता पक्ष के एक सांसद द्वारा दो पूर्व प्रधानमंत्रियों पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी का भी जिक्र नोटिस में है। आरोप है कि विपक्ष की आपत्ति के बावजूद उस टिप्पणी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके साथ ही स्पीकर द्वारा विपक्षी महिला सांसदों को लेकर की गई टिप्पणी को भी आपत्तिजनक बताया गया है।

हालांकि प्रस्ताव लाने वाले सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे व्यक्तिगत रूप से लोकसभा स्पीकर का सम्मान करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि सदन के संचालन में निष्पक्षता और संतुलन की कमी दिखाई दी है। नोटिस मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर ने सचिव जनरल को इसकी जांच करने और नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कहा कि विपक्ष के पास संख्या बल न होने के बावजूद यह प्रस्ताव एक संदेश देने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार है और चेयर से अपेक्षा होती है कि वह सभी सांसदों के साथ समान व्यवहार करे।

राहुल गांधी के हस्ताक्षर न होने को लेकर पूछे गए सवाल पर मोहम्मद जावेद ने कहा कि भले ही राहुल गांधी ने साइन नहीं किए हों, लेकिन 118 सांसदों का समर्थन अपने आप में एक मजबूत संदेश है। वहीं टीएमसी के समर्थन को लेकर उन्होंने कहा कि पार्टी के सांसदों के हस्ताक्षर भले ही नोटिस पर न हों, लेकिन वे विपक्ष के साथ खड़े हैं।

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