बिहार विधानसभा चुनाव 2025 पर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंची जन सुराज पार्टी, दोबारा चुनाव की मांग से सियासी हलचल तेज

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Javed Haider Zaidi

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को चुनौती देने के बाद सुप्रीम कोर्ट परिसर में जन सुराज पार्टी और प्रशांत किशोर से जुड़ी सियासी हलचल की प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों को लेकर एक बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक विवाद सामने आया है। चुनाव रणनीतिकार से राजनेता बने Prashant Kishor (प्रशांत किशोर) की पार्टी जन सुराज पार्टी (JSP) ने चुनाव प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी ने राज्य में हुए विधानसभा चुनाव को रद्द कर नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की है। इस याचिका के बाद बिहार की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है।

जन सुराज पार्टी की ओर से दायर रिट याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आचार संहिता लागू रहने के दौरान राज्य सरकार ने ऐसे फैसले लिए, जिनसे चुनाव की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पार्टी का दावा है कि इन कदमों से मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित किया गया और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा।

महिला मतदाताओं को 10-10 हजार रुपये देने पर सवाल

याचिका में सबसे बड़ा मुद्दा मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिला मतदाताओं को कथित तौर पर 10-10 हजार रुपये का प्रत्यक्ष हस्तांतरण बताया गया है। जन सुराज पार्टी का कहना है कि चुनाव अवधि के दौरान नए लाभार्थियों को जोड़ना और बड़ी राशि जारी करना न केवल चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधान के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है।

पार्टी ने तर्क दिया है कि इस तरह के भुगतान से मतदाताओं की स्वतंत्र इच्छा प्रभावित हो सकती है, जिससे चुनाव परिणामों की निष्पक्षता पर सीधा असर पड़ता है। याचिका के अनुसार, 25 से 35 लाख महिला मतदाताओं को इस योजना के तहत मौद्रिक लाभ मिला, जो चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त था।

संविधान के कई अनुच्छेदों के उल्लंघन का आरोप

अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका में कहा गया है कि ये भुगतान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), 112 और 202 (वित्तीय प्रावधान) तथा अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग की शक्तियां) का उल्लंघन करते हैं। जन सुराज पार्टी का कहना है कि इन कथित अनियमितताओं से चुनाव आयोग की निष्पक्ष भूमिका पर भी सवाल उठते हैं।

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पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह चुनाव आयोग को निर्देश दे कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणामों को अमान्य घोषित किया जाए और राज्य में दोबारा चुनाव कराया जाए।

मतदान केंद्रों पर जीविका समूहों की तैनाती भी विवाद में

जन सुराज पार्टी ने अपनी याचिका में एक और गंभीर आरोप लगाया है। पार्टी के अनुसार, मतदान केंद्रों पर जीविका स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी करीब 1.8 लाख महिलाओं की तैनाती की गई, जो कानूनन सही नहीं थी। याचिका में कहा गया है कि इस उपस्थिति ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और अखंडता को और कमजोर किया।

पार्टी ने संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 का हवाला देते हुए इसे भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में बताया है। जन सुराज पार्टी का दावा है कि इस तरह की व्यवस्थाओं से मतदाताओं पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव बना।

सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पीठ करेगी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची शामिल हैं। अदालत में होने वाली सुनवाई पर न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक निगाहें टिकी हैं। यदि अदालत याचिका को गंभीर मानती है, तो इसके दूरगामी राजनीतिक और संवैधानिक परिणाम हो सकते हैं।

बढ़ी सियासी सरगर्मी

जन सुराज पार्टी की इस कानूनी पहल ने बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर विपक्ष इसे लोकतंत्र की रक्षा से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ खेमे की ओर से आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके रुख पर टिकी है, जो यह तय करेगा कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 पर आगे क्या असर पड़ता है।

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: 118 सांसदों के हस्ताक्षर, राहुल गांधी के साइन न होने पर उठे सवाल

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लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस, 118 सांसदों के हस्ताक्षर, राहुल गांधी के साइन न होने पर राजनीतिक चर्चा

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा सचिवालय में सौंप दिया है। इस प्रस्ताव पर कुल 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि, इस पूरी कवायद में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय यह रहा कि नेता विपक्ष राहुल गांधी के हस्ताक्षर इस नोटिस में शामिल नहीं हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों ने भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

विपक्षी सांसदों ने संविधान के अनुच्छेद 94(सी) के तहत यह नोटिस दिया है। आरोप है कि लोकसभा स्पीकर का रवैया सदन के संचालन में भेदभावपूर्ण रहा है और विपक्ष को बार-बार बोलने से रोका गया। नोटिस में स्पीकर के आचरण को लेकर चार प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख किया गया है।

विपक्ष का कहना है कि 2 फरवरी को नेता विपक्ष राहुल गांधी को सदन में बोलने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद 3 फरवरी को विपक्ष के आठ सांसदों को निलंबित किया गया, जिसे एकतरफा कार्रवाई बताया गया है। 4 फरवरी को सत्ता पक्ष के एक सांसद द्वारा दो पूर्व प्रधानमंत्रियों पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी का भी जिक्र नोटिस में है। आरोप है कि विपक्ष की आपत्ति के बावजूद उस टिप्पणी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके साथ ही स्पीकर द्वारा विपक्षी महिला सांसदों को लेकर की गई टिप्पणी को भी आपत्तिजनक बताया गया है।

हालांकि प्रस्ताव लाने वाले सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे व्यक्तिगत रूप से लोकसभा स्पीकर का सम्मान करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि सदन के संचालन में निष्पक्षता और संतुलन की कमी दिखाई दी है। नोटिस मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर ने सचिव जनरल को इसकी जांच करने और नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कहा कि विपक्ष के पास संख्या बल न होने के बावजूद यह प्रस्ताव एक संदेश देने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार है और चेयर से अपेक्षा होती है कि वह सभी सांसदों के साथ समान व्यवहार करे।

राहुल गांधी के हस्ताक्षर न होने को लेकर पूछे गए सवाल पर मोहम्मद जावेद ने कहा कि भले ही राहुल गांधी ने साइन नहीं किए हों, लेकिन 118 सांसदों का समर्थन अपने आप में एक मजबूत संदेश है। वहीं टीएमसी के समर्थन को लेकर उन्होंने कहा कि पार्टी के सांसदों के हस्ताक्षर भले ही नोटिस पर न हों, लेकिन वे विपक्ष के साथ खड़े हैं।

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