बांग्लादेश में हादी की मौत के बाद हिंसा और प्रदर्शन: ढाका विश्वविद्यालय से संसद तक तनाव बढ़ा

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Javed Haider Zaidi

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बांग्लादेश में हादी की मौत के बाद छात्रों और प्रदर्शनकारियों का उग्र प्रदर्शन

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद देशभर में राजनीतिक और सामाजिक तनाव बढ़ गया है। हादी, जो स्थानीय छात्र संगठन और युवा राजनीति में सक्रिय थे, की अचानक मौत ने छात्रों और युवा वर्ग को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया। उनके समर्थक न्याय की मांग कर रहे हैं और प्रदर्शनकारियों की संख्या हर गुजरते दिन बढ़ती जा रही है।

हादी की मौत: कैसे शुरू हुआ विवाद

शरीफ हादी, 32 वर्ष के छात्र नेता और चुनावी उम्मीदवार, को दिसंबर के पहले सप्ताह में गोली लगी थी। गंभीर चोटों के कारण उन्हें सिंगापुर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। मौत की खबर आते ही ढाका और आसपास के शहरों में छात्रों और युवा समर्थकों में गुस्सा और शोक फैल गया।

विश्लेषकों के अनुसार, हादी की मौत केवल व्यक्तिगत दुख नहीं बल्कि देश के राजनीतिक असंतोष का प्रतीक बन गई है। युवा इसे मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ एक आवाज़ मान रहे हैं।

ढाका विश्वविद्यालय में छात्र प्रदर्शन

ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने हादी की मौत के विरोध में कैंडल मार्च, धरना और प्रदर्शन आयोजित किए। छात्रों ने कहा कि न्याय न मिलने तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। छात्रों का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन ने घटना की जांच में देरी की और दोषियों को बचाने की कोशिश की।

“हादी हमारे लिए केवल एक नेता नहीं, बल्कि हमारी आवाज़ था। न्याय मिलने तक हम सड़क पर रहेंगे।” – छात्र नेता मुहम्मद फरीद ने कहा।

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छात्रों ने विश्वविद्यालय कैंपस से शुरू होकर शाहबाग चौक तक मार्च किया। मार्च के दौरान कई जगह बैरिकेडिंग और पुलिसकर्मी तैनात थे।

संसद भवन के पास हिंसक झड़पें

हादी के अंतिम संस्कार के बाद बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी संसद भवन की ओर बढ़े। सुरक्षा बलों ने कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की, लेकिन प्रदर्शनकारी बाधाओं को तोड़ने में सफल रहे। कई जगह धक्का-मुक्की और तनावपूर्ण स्थितियां बनीं।

प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए, “न्याय दो, हादी की हत्या का जिम्मेदार पकड़ो।” प्रशासन ने शहर में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं।

देशव्यापी शोक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

हादी की मौत पर बांग्लादेश के कई शहरों में राष्ट्रीय शोक मनाया गया। कई विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों ने मौन धरना रखा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना देश की राजनीतिक स्थिति को और संवेदनशील बना रही है। विशेष रूप से अगले साल फरवरी में होने वाले चुनावों की पृष्ठभूमि में यह घटना और भी महत्व रखती है।

“यह सिर्फ एक युवा नेता की मौत नहीं है, बल्कि देश के युवा वर्ग की नाराजगी और असंतोष का प्रतीक है।” – राजनीतिक विश्लेषक शम्स उल हक

जनाक्रोश का कारण और भविष्य की संभावनाएं

विश्लेषकों के अनुसार हादी की हत्या से उभरा जनाक्रोश सिर्फ छात्र वर्ग तक सीमित नहीं है। आम नागरिक और युवा वर्ग भी इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। सरकार ने सुरक्षा बढ़ा दी है, लेकिन तनाव अभी कम नहीं हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर न्याय नहीं मिला, तो यह प्रदर्शन लंबे समय तक जारी रह सकता है और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा सकता है।

निष्कर्ष

बांग्लादेश में हादी की मौत ने न केवल ढाका बल्कि पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक असंतोष को हवा दी है। छात्र, युवा और नागरिक न्याय की मांग कर रहे हैं। प्रशासन ने सुरक्षा बढ़ा दी है, लेकिन हिंसक प्रदर्शन और जनाक्रोश के संकेत लगातार मिल रहे हैं।

देश और विदेश की मीडिया लगातार घटनाओं को कवर कर रही है, और आने वाले दिनों में यह मामला राजनीतिक बहस और चुनावी चर्चाओं का केंद्र बनेगा।

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वॉशिंगटन पोस्ट की बड़ी छंटनी में शशि थरूर के बेटे ईशान थरूर की नौकरी गई, 12 साल का सफर अचानक थमा

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वॉशिंगटन पोस्ट की छंटनी की खबर के बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर के बेटे और वरिष्ठ पत्रकार ईशान थरूर की फाइल फोटो, जो अखबार से 12 साल की सेवा के बाद नौकरी से हटाए गए।

अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार वॉशिंगटन पोस्ट में बड़े पैमाने पर हुई छंटनी ने अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता जगत को झकझोर कर रख दिया है। इस फैसले की चपेट में कांग्रेस सांसद शशि थरूर के बेटे और जाने-माने विदेशी मामलों के पत्रकार ईशान थरूर भी आ गए हैं। करीब 12 वर्षों तक अखबार से जुड़े रहने के बाद ईशान को नौकरी से हटा दिया गया है। उन्होंने खुद सोशल मीडिया के जरिए इस मुश्किल दौर की जानकारी दी और अपने दर्द को शब्दों में साझा किया।

एक तिहाई कर्मचारियों की छंटनी

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वॉशिंगटन पोस्ट ने अपने कुल कर्मचारियों के लगभग एक तिहाई हिस्से को नौकरी से निकाल दिया है। इस प्रक्रिया में अखबार का खेल विभाग बंद कर दिया गया है, जबकि कई विदेशी कार्यालयों पर भी ताले लग गए हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि लगभग 800 पत्रकारों की टीम में से 300 से अधिक कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है।

ईशान थरूर ने क्या कहा

ईशान थरूर ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि आज उन्हें वॉशिंगटन पोस्ट से हटा दिया गया है और उनके साथ अधिकांश अंतरराष्ट्रीय स्टाफ और कई बेहद प्रतिभाशाली सहकर्मियों की भी छुट्टी कर दी गई है। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने न्यूज रूम और खासतौर पर उन पत्रकारों के लिए गहरा दुख है, जिन्होंने वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग में अखबार की पहचान बनाई।
ईशान ने यह भी कहा कि लगभग 12 वर्षों तक जिन संपादकों और संवाददाताओं के साथ उन्होंने काम किया, वे केवल सहकर्मी नहीं बल्कि दोस्त रहे, और उनके साथ काम करना उनके लिए सम्मान की बात रही।

‘वर्ल्डव्यू’ कॉलम और पाठकों का साथ

ईशान थरूर ने जनवरी 2017 में वर्ल्डव्यू नाम से कॉलम शुरू किया था, जिसका उद्देश्य दुनिया की घटनाओं और उसमें अमेरिका की भूमिका को सरल और स्पष्ट तरीके से पाठकों तक पहुंचाना था। उन्होंने बताया कि करीब पांच लाख वफादार पाठकों ने वर्षों तक सप्ताह में कई बार इस कॉलम को पढ़ा, जिसके लिए वह हमेशा आभारी रहेंगे।

वॉशिंगटन पोस्ट में भूमिका

ईशान थरूर वॉशिंगटन पोस्ट में विदेश मामलों के लेखक के तौर पर काम कर रहे थे। भारतीय राजनीति और वैश्विक घटनाओं पर उनकी पकड़ को लेकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल अमेरिका के दौरे पर था, तब ईशान अपने पिता शशि थरूर से सवाल पूछने को लेकर चर्चा में भी आए थे।

सोशल मीडिया पर समर्थन

ईशान थरूर की छंटनी की खबर सामने आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कई पत्रकारों और पाठकों ने उनके समर्थन में आवाज उठाई। लोगों ने उन्हें एक बेहतरीन और गंभीर पत्रकार बताया और वॉशिंगटन पोस्ट के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।

अखबार प्रबंधन की सफाई

अखबार के कार्यकारी संपादक मैट मरे ने इस फैसले को “दुखद लेकिन जरूरी” बताया है। उनका कहना है कि बदलती तकनीक, डिजिटल मीडिया के प्रभाव और पाठकों की आदतों में आए बदलावों के अनुरूप खुद को ढालने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था, ताकि अखबार को भविष्य के लिए बेहतर दिशा दी जा सके।

मालिकाना हक और पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस हैं। उन्होंने साल 2013 में यह अखबार ग्राहम परिवार से करीब 25 करोड़ डॉलर में खरीदा था। तब से अखबार डिजिटल बदलाव के दौर से गुजर रहा है, लेकिन हालिया छंटनी ने पत्रकारिता के भविष्य और मीडिया संस्थानों की स्थिरता पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

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