राजकीय शोक खत्म होते ही सुनेत्रा पवार का शपथ ग्रहण, एनसीपी नेताओं ने क्यों लिया इतना जल्दी फैसला? जानिए पूरी खबर

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Javed Haider Zaidi

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राजकीय शोक समाप्त होने के बाद मुंबई में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेतीं सुनेत्रा पवार, मंच पर मौजूद राज्य सरकार और एनसीपी के वरिष्ठ नेता।

महाराष्ट्र की राजनीति में राजकीय शोक समाप्त होते ही एक बड़ा और अहम फैसला सामने आया। एनसीपी नेता सुनेत्रा पवार (Sunetra Pawar) ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर ली। शपथ ग्रहण का समय और इतनी जल्दी लिया गया निर्णय अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। सत्ता पक्ष जहां इसे जरूरी प्रशासनिक कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे जल्दबाजी करार दे रहा है।

राज्य में हाल ही में राजकीय शोक की घोषणा के चलते कई सरकारी और राजनीतिक कार्यक्रम टाल दिए गए थे। जैसे ही शोक की अवधि समाप्त हुई, उसी दिन सरकार और एनसीपी नेतृत्व ने शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करने का निर्णय लिया।

शपथ ग्रहण समारोह कैसे हुआ?

राजकीय शोक खत्म होने के बाद आयोजित शपथ ग्रहण समारोह सादे लेकिन औपचारिक तरीके से हुआ। इसमें राज्य सरकार के वरिष्ठ मंत्री, गठबंधन दलों के नेता और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। शपथ लेने के साथ ही सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल ली।

एनसीपी नेताओं ने कहा कि यह समारोह पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया के तहत किया गया और इसमें किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है।

एनसीपी ने जल्दी फैसला क्यों लिया?

एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार, इस फैसले के पीछे कई कारण थे—

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  • प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखना: उपमुख्यमंत्री पद लंबे समय तक खाली रहने से सरकार के कामकाज पर असर पड़ सकता था।
  • गठबंधन सरकार का संतुलन: महायुति सरकार में सभी दलों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी था।
  • पार्टी नेतृत्व की निरंतरता: पार्टी के भीतर किसी तरह की असमंजस की स्थिति न बने, इसके लिए तुरंत फैसला लिया गया।

एनसीपी का कहना है कि देर करने से राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर अनिश्चितता बढ़ सकती थी।

विपक्ष ने उठाए सवाल

विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि राजकीय शोक खत्म होने के तुरंत बाद शपथ ग्रहण कराना संवेदनशील नहीं लगता। विपक्ष का तर्क है कि कुछ दिन इंतजार किया जा सकता था ताकि माहौल पूरी तरह सामान्य हो जाए।

हालांकि सरकार और एनसीपी नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राजकीय शोक समाप्त होने के बाद संवैधानिक रूप से सरकार को फैसले लेने का पूरा अधिकार होता है।

राजनीतिक मायने क्या हैं?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ एक नियुक्ति नहीं है, बल्कि इसके कई राजनीतिक संकेत भी हैं—

  • इससे एनसीपी नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि पार्टी संगठित और मजबूत है।
  • गठबंधन सरकार में स्थिरता बनाए रखने की कोशिश की गई है।
  • आने वाले समय में एनसीपी की रणनीति और भूमिका और साफ हो सकती है।

इसके साथ ही, सुनेत्रा पवार के सामने अब संगठन और सरकार दोनों की जिम्मेदारियां होंगी।

आगे की राह

शपथ ग्रहण के बाद अब सभी की नजर इस बात पर है कि सुनेत्रा पवार अपनी नई जिम्मेदारी को कैसे निभाती हैं। राज्य के विकास, प्रशासनिक फैसलों और गठबंधन के तालमेल में उनकी भूमिका अहम मानी जा रही है।

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: 118 सांसदों के हस्ताक्षर, राहुल गांधी के साइन न होने पर उठे सवाल

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लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस, 118 सांसदों के हस्ताक्षर, राहुल गांधी के साइन न होने पर राजनीतिक चर्चा

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा सचिवालय में सौंप दिया है। इस प्रस्ताव पर कुल 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि, इस पूरी कवायद में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय यह रहा कि नेता विपक्ष राहुल गांधी के हस्ताक्षर इस नोटिस में शामिल नहीं हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों ने भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

विपक्षी सांसदों ने संविधान के अनुच्छेद 94(सी) के तहत यह नोटिस दिया है। आरोप है कि लोकसभा स्पीकर का रवैया सदन के संचालन में भेदभावपूर्ण रहा है और विपक्ष को बार-बार बोलने से रोका गया। नोटिस में स्पीकर के आचरण को लेकर चार प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख किया गया है।

विपक्ष का कहना है कि 2 फरवरी को नेता विपक्ष राहुल गांधी को सदन में बोलने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद 3 फरवरी को विपक्ष के आठ सांसदों को निलंबित किया गया, जिसे एकतरफा कार्रवाई बताया गया है। 4 फरवरी को सत्ता पक्ष के एक सांसद द्वारा दो पूर्व प्रधानमंत्रियों पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी का भी जिक्र नोटिस में है। आरोप है कि विपक्ष की आपत्ति के बावजूद उस टिप्पणी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके साथ ही स्पीकर द्वारा विपक्षी महिला सांसदों को लेकर की गई टिप्पणी को भी आपत्तिजनक बताया गया है।

हालांकि प्रस्ताव लाने वाले सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे व्यक्तिगत रूप से लोकसभा स्पीकर का सम्मान करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि सदन के संचालन में निष्पक्षता और संतुलन की कमी दिखाई दी है। नोटिस मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर ने सचिव जनरल को इसकी जांच करने और नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कहा कि विपक्ष के पास संख्या बल न होने के बावजूद यह प्रस्ताव एक संदेश देने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार है और चेयर से अपेक्षा होती है कि वह सभी सांसदों के साथ समान व्यवहार करे।

राहुल गांधी के हस्ताक्षर न होने को लेकर पूछे गए सवाल पर मोहम्मद जावेद ने कहा कि भले ही राहुल गांधी ने साइन नहीं किए हों, लेकिन 118 सांसदों का समर्थन अपने आप में एक मजबूत संदेश है। वहीं टीएमसी के समर्थन को लेकर उन्होंने कहा कि पार्टी के सांसदों के हस्ताक्षर भले ही नोटिस पर न हों, लेकिन वे विपक्ष के साथ खड़े हैं।

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